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++++ धीरे धीरे बिनाश के पेर समय के साथ मिलकर अपनी लीला प्रारम्भ किये।जबकि दुसरी बिनास के मजबूत पीलर देवव्रत का भीष्मप्रतिज्ञा बना राजसिंघासन पर बिराजमान ब्यक्ति हमारे पिता तुल्य होंगे हम अक्षर सह उनके आदेश का पालन करेंगे इसका सबसे ज्यादा दुरुपयोग धृतराष्ट्र ने किये अपने पुत्र मोह में और दूर्योधन ने बिनास कार्यो को पूरा करदिया ।
कही हम अभिभावक धृतराष्ट्र तो नही? !
हम भी तो अपने संतानों के हठ को स्वीकार करलेते हैं इस मोह के बहाव में हम ऐसा भी कई कार्य कर लेते हैं ,जो आपके अपने नज़र में भी गलत हैं फिर भी करते हैं ।जैसे मूकदर्शक धनुर्धर भीष्म ना चाहते हुबे चीरहरण ,बनवाश ,लक्ष्यगृह ,अज्ञातवाश और युद्ध ये सब कुछ यदि भीष्म चाहते तो रोक सकते थे ।उनके जीवन को किंतु परन्तु ने अपने अधिनस्त कर लिया क्योकि उनका भावनात्मक प्रतिज्ञा । हम भी अपने संतानों के लिये यही तो करते है अपने अभिभावक से अपने सहोदर से लर कर उनको उनके अधिकार से अधिक दिलाना चाहते हैं जिसके लिये परिवार,समाज में लोगों का सोसन करते हैं हम अपने संतानों के लिये । हम उनके भाग्यबिधता बनजाते हैं और लिख देते हैं बिनाश और जब तक कार्य पूरा नाही हो जाता तब तक आप थकते नही।
मगर जब हम थक जाते हैं तब जो हमारे सामने से गुजरती हैं हमारा जीवन तृसकार युक्त जो अभिभावक को अपाहिज बना देता हैं बान के सर सज्या पर जिंदा ही सुलाता हैं । जैसे भीष्म ने अर्जुन के बाण पर सोने के बाद अपने कर्मो के लिये प्रायश्चित करते हैं शरीर के एक एक बून्द रक्त को निकाल कर । मगर हम फिर भी कभी अपने कर्मो के प्रति प्रायश्चित नही करते ।इसी लिये मानवीय सभ्यता पुनः ब्यक्ति पर सीमित हो रही हैं।आज पूरा विश्व अशान्त हैं पूरे बिस्व में क्राइसिस हैं मानवीय मोह के चलते ।मोह माया गलत तो नही मगर दिशाविहीन होने से यह बिनाश की जननी होती हैं ।
आज बस इतना ही
शान्ति शक्ति और आनन्द सभी के लिये।
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